Chhatrapati Shivaji Maharaj। छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास - ज्ञानीभारत.com

Chhatrapati Shivaji Maharaj। छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास

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प्रमुख राजवंश और उनकी राजधानी
Chhatrapati Shivaji Maharaj। छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास

Chhatrapati Shivaji Maharaj। छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास

इतिहास मानव से ज्यादा उसकी गाथा में रुचि रखता है इतिहास को जंग याद रहती है लेकिन शहीद नहीं।

Chhatrapati Shivaji Maharaj। छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास

Chhatrapati Shivaji Maharaj। छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास ये दुनिया की सच्चाई है कि इतिहास केवल व्यक्ति की गाथा को ही याद रखता रहा है। इतिहास में ना जाने कितने शूरवीरों ने जन्म लिया और इस धरती मां की रक्षा के लिए बलिदान हो गए। आज हम ऐसे ही शूरवीर छत्रपति शिवाजी महाराज की गाथा पर चर्चा करेंगे। छत्रपति शिवाजी महाराज मराठा के वीर योद्धा थे और हिन्दू गणराज्य के एक महानायक। उन्होंने कई बार मुगलों को धूल चटाई। ये भारत के महानतम शासकों में से एक माने गए हैं। ये भारत के अमर स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने भारत में एक स्वतंत्र राष्ट्र का सपना देखा।

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फ़रवरी 1630 को पूना के निकट शिवनेर के दुर्ग में हुआ था। इनके पिता शाहजी भोंसले और माता जीजाबाई थीं। देवी सिवाई के नाम पर इनका नाम शिवाजी रखा गया। क्योंकि उनकी माता जीजाबाई देवी सिवाई की भक्त थी। उनके पिता जुन्नर के निकट शिवनेर के दुर्ग में नौकरी करते थे। इनके पिता शाहजी भोंसले भी एक पराक्रमी व्यक्ति थे। वीर शिवाजी के जन्म के समय भारत में मुगलों का शासन था। मुगल वंश का शासक औरंगजेब शासन कर रहा था। औरंगजेब के शासनकाल में हिन्दू जनता दुखी थी। चारों तरफ त्राहि त्राहि मची हुई थी। मुगलों ने भारत के अनगिनत मन्दिर को नष्ट कर दिया। बहुसंख्यक हिन्दुओं को जबरन मुस्लिम बनाया गया। ऐसे में शिवाजी का जन्म हिन्दुओं के लिए वरदान साबित हुआ। 

माता जीजबाई का योगदान

कहते हैं कि एक मां को उसकी संतान बेहद प्रिय होती है। वह अपनी संतान को कभी अपने हृदय से अलग नहीं करती। जब बात भारत मां की रक्षा की हो तो एक मां अपनी संतान को खुशी – खुशी न्यौछावर कर देती है। ऐसी ही थी मां जीजाबाई। जीजाबाई धार्मिक नारी होने के साथ साथ एक वीरांगना महिला थी। उन्हें आभास था कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो सम्पूर्ण भारत में विदेशी ताकतें अपनी जड़े जमा लेगी। इसलिए वह इन ताकतें से भारत को मुक्त करने के लिए बचपन से ही वीर शिवाजी के मन में वीरता का बीजारोपण कर रही थी।

वह शिवाजी को बचपन से ही अर्जुन, भगवान श्री कृष्ण, राम, सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य और रानी अहिल्यबाई की कहानियां सुनाया करती थी। इससे शिवाजी के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। माता जीजाबाई वीर शिवाजी को वो हर शिक्षा दे रही थी जो एक शूरवीर को दी जाती है। उन्होंने शिवाजी को बचपन से ही युद्ध जितने के गुर सिखाए। उन्होंने तलवारबाजी, घुड़सवारी और निशानेबाजी में शिवाजी को निपुण किया। माता जीजाबाई ने एक ऐसा शूरवीर तैयार किया जिसने मुगल और बीजापुर के शासक की ईंट से ईंट बजा दी।

युद्ध कौशल में निपुण शिवाजी के राजनीतिक शिक्षक दादा कोंडदेव थे। दादा कोंडदेव ने उनको राजनीतिक गुर सिखाए। कोंडदेव ने उन्हें सभी विधाओं में निपुण किया। समर्थ गुरु रामदास की छत्रछाया में आकर वीर शिवाजी देशभक्त और कर्मठ योद्धा बन गए। वैसे तो वीर शिवाजी को एक महान योद्धा बनाने में माता जीजाबाई का बहुत बड़ा योगदान है। वीर शिवाजी बचपन से ही माता जीजाबाई की देखरेख में पल्लवित हुए थे। 

एक स्त्री के लिए उसका सबसे बड़ा अधिकार उसका मां बनने का है।

शिवाजी का विवाह

शिवाजी का विवाह कम आयु में ही हो गया। मात्र 10 वर्ष की आयु में वह शादी के बन्धन में बन्ध गए। उनका विवाह 14 मई 1640 को लाल महल पुणे में सहबाई निम्बालकर से हुआ। साहबाई निम्बालकर के अलावा के उनकी चार पत्नियां और थी। जिनका नाम पुतलीबाई पालकर, सोयराबाई मोहते,  सकवर बाई गायकवाड़ और काशीबाई जाधव थीं।

शिवाजी के दो पुत्र और चार पुत्रियां थीं। जिनका नाम संभाजी, राजाराम, अंबिका बाई, रेनुबाई जाधव, सखुबाई निंबलकर और राजकुमार बाई सिर्के था। संभाजी शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र थे। शिवाजी की मृत्यु के बाद संभाजी ने ही शासन की बागडोर संभाली। संभाजी पिता की भांति पराक्रमी नहीं बन पाए। 

एक पेड़, जोकि इतनी उच्च जीवित सत्ता नहीं है, इतना सहिष्णु और दयालु है कि किसी के मारे जाने पर भी उसे मीठे आम दे; मैं तो एक राजा हूं, तो क्या मुझे एक पेड़ से अधिक सहिष्णु और दयालु नहीं होना चाहिए?

शिवाजी की विजय

शिवाजी भारत से मुगलों को उखाड़ फेंकना चाहते थे। वह भारत में एक स्वतंत्र मराठा साम्राज्य के उदय का सपना देख रहे थे। वीर शिवाजी ने 1643 को बीजापुर के शासक आदिलशाह को युद्ध के लिए ललकारा। शिवाजी और बीजापुर के शासक के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में शिवाजी ने अपने युद्ध कौशल का परिचय दिया और बीजापुर की ईंट से ईंट बजा दी। शिवाजी ने बीजापुर के सिंहगढ़ के किले पर अधिकार कर लिया। शिवाजी का सपना था कि तोरण पर उनका अधिकार हो, उन्होंने बीजापुर के शासक के पास एक दूत भेजा और कहा कि वह तोरण के किले के बदले एक अच्छी रकम देने को तैयार है। यह किला वीर शिवाजी को दे दिया गया।

वीर शिवाजी ने इस किले का जीर्णोद्धार कराया। सिंहगढ़ से थोड़ी दूर स्थित राजगढ़ के किले पर शिवाजी का अधिकार हो गया। जब इस बात का पता आदिलशाह को चला तो वह आग बबूला हो गया उसने वीर शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले को बन्दी बना लिया। वीर शिवाजी को जब इस बात की सूचना मिली तो उन्होंने ठंडे दिमाग से काम लिया। शिवाजी छापामार नीति के सहारे आदिलशाह के महल में घुसे और शाहजी भोंसले को आदिलशाह के चुंगल से बाहर निकाला। मात्र सोलह साल की उम्र में तोरण पर उनका पुन: अधिकार हो गया। इस जीत के साथ शिवाजी का सितारा चमक उठा।

उन्होंने मराठा साम्राज्य का विस्तार किया। उन्होंने एक के बाद एक कई किले पर अधिकार कर लिया। चाकन, तिकोना, कोंकण, लोहागढ़, राजगढ़ और तोरण अब शिवाजी के अधीन थे। शिवाजी के पराक्रम के चर्चे सब जगह होने लगे। उनके पराक्रम से बीजापुर का शासक और औरंगजेब घबरा गए। वह दोनों वीर शिवाजी की बढ़ती शक्ति को दबाना चाहते थे। बीजापुर के शासक ने सेनापति अफजल खां को बुलाया और उसके नेतृत्व में एक सैनिक टुकड़ी भेजी। अफजल खां और वीर शिवाजी के बीच करीब दो माह तक युद्ध चला। अंत में अफजल खां ने वीर शिवाजी को संधि के लिए एक तम्बू में आमंत्रित किया।

भाष्कर नामक ब्राह्मण ने बताया कि अफजल खां आपको मारना चाहता है। वीर शिवाजी सावधान हो गए। दोनों की मुलाकात प्रतापगढ़ के निकट स्थित पार नामक स्थान पर हुई। वहां पर शिवाजी ने 2 नवम्बर 1659 को अपने वाघनख नामक हथियार से अफजल खां का वध कर दिया। 

मुगलों के साथ संघर्ष 

शिवाजी का पहली बार मुगलों से मुकाबला 1657 ईसवी में हुआ था। जब बीजापुर के शासक आदिलशाह की मृत्यु के बाद पूरे राज्य में अव्यवस्था फैल गई थी। इसका लाभ उठाकर औरंगजेब ने बीजापुर पर हमला कर दिया। शिवाजी ने मुगलों के जुन्नर नगर पर आक्रमण कर खूब लूटपाट मचाई। जब औरंगजेब को पता चला तो वह आग बबूला हो गया।उसने शिवाजी को पराजित करने के लिए साइस्ता खां को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया।

वीर शिवाजी को दण्डित करने के लिए उसने शाइस्ता खां को करीब 200000 लाख सैनिक के साथ रवाना किया। 1663 में शाइस्ता खां ने चाकन और सूपन में खूब उत्पात मचाया। जब अफजल खां वर्षा ऋतु के समय पूना के महल में आराम कर रहा था तो वीर शिवाजी चन्द सैनिकों के साथ शाइस्ता खां के लाल महल पुणे में घुसे। यह महल 1 लाख सैनिक की सुरक्षा के घेरे में था। वीर शिवाजी ने अपनी कमांडो युद्ध नीति से महल को भेद दिया। महल में सो रहे शाइस्ता खां पर हमला किया। शाइस्ता खां दुम दबाकर भाग गया और उसके बेटे को मौत के घाट उतार दिया। इस ऑपरेशन में शिवाजी ने कमांडो तकनीकी का प्रयोग किया था। 

पूना की जीत से वीर शिवाजी के हौंसले बुलंद थे। 1664 को उन्होंने सूरत पर हमला बोला। सूरत उस समय मुगलों का आर्थिक केन्द्र था। जिससे वीर शिवाजी को वहां से करोड़ों की संपत्ति हाथों लगी।शिवाजी को दण्डित करने के लिए औरंगजेब ने राजा जयसिंह को बुलाया। राजा जयसिंह एक कुशल सेनापति था। जयसिंह ने बीजापुर के शासक को अपने साथ लेकर 12 अप्रैल 1665 में वज्रगढ़ के किले पर अधिकार कर लिया। जयसिंह ने अपने दूसरे चरण में पुरंदर के किले को निशाना बनाया। पुरंदर की रक्षा करते हुए शिवाजी का वफादार सेनापति मुरार जी बाजी मारा गया। अपनी हार मानकर शिवाजी ने 14 जून 1665 को जयसिंह के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। जिसे पुरंदर की संधि कहा गया।

इस संधि के तहत शिवाजी को अपने 23 किले मुगलों को सौंपने थे और अपने पुत्र संभाजी को मुगलों की सेवा में भेजना था। शिवाजी संधि के लिए राजी हो गए। औरंगजेब ने पुरंदर की संधि के लिए वीर शिवाजी को महल में बुलाया। महल में उचित सम्मान न मिलने पर शिवाजी ने औरंगजेब को धोखेबाज कहा।औरंगजेब यह सुनकर आग बबूला हो गया और उसने शिवाजी और संभाजी को जयपुर भवन कैद कर लिया लिया। वहां से 13 अगस्त 1666 को शिवाजी मिठाई की टोकरी में छुपकर भाग निकले और 22 सितम्बर 1666 को रायगढ़ के किले में पहुंचे।

राज्याभिषेक और मराठा साम्राज्य की स्थापना

पुरंदर की संधि में दिए अपने 23 किलों को जीतने के लिए वीर शिवाजी ने सैनिक अभियान छेड़ा। उन्होंने मुगल शासक औरंगजेब की ईंट से ईंट बजा दी और अपने सभी किले वापस ले लिए। औरंगजेब वीर शिवाजी के पराक्रम से अचंभित था। उसे वीर शिवाजी को ‘राजा की उपाधि’ प्रदान करनी पड़ी।

मुगल राज्य वीर शिवाजी से इस कदर घबराने लगे कि वह मराठा को चौथ और सरदेशमुखी नामक कर देने लगे। 16 जून 1674 को रायगढ़ के किले में शिवाजी का राज्याभिषेक किया गया। इसी अवसर पर वीर शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण की। उन्होंने एक नए मराठा साम्राज्य की स्थापना की। उन्होंने एक अष्ठ मंत्री परिषद् का भी गठन किया। यह मंत्रिपरिषद उनको प्रशासनिक कार्यों में सलाह दिया करती थी।

शिवाजी का निधन

राज्याभिषेक के मात्र 6 साल बाद 1680 में एक लंबी बीमारी के चलते वीर शिवाजी का देहांत हो गया। उनका शासनकाल हिन्दुओं के लिए शांति और खुशी प्रदान करने वाला था। उनका शासन राष्ट्रभक्ति से प्रेरित था। उनके शासनकाल में हिन्दू जनता सुखी थी। उन्होंने हिन्दू जनता के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा की। उन्होंने औरंगजेब के डरावने शासन में जी रही हिन्दू जनता को भय से मुक्त कराया। 

शिवाजी की स्थाई सेना

शिवाजी इतिहास में अमर है। उनका शासन एक सुसंगठित शासन था। उनको अपने पिता से मात्र 15000 हजार सैनिक ही मिले थे। उन्होंने अपने बल से एक स्थाई सेना खड़ी की। उनकी सेना में लगभग 150000 सैनिक थे। वह अपने सैनिकों का पिता की भांति ख्याल रखते थे। कहा जाता है कि वीर शिवाजी मुस्लिम विरोधी थी, परंतु यह सत्य नहीं है उनकी सेना में मुस्लिम सैनिक भी थे। उनका संघर्ष तो कट्टरता के विरुद्ध था जो औरंगजेब और बीजापुर जैसे दुष्ट शासकों की छत्रछाया में पल रहा था।

शिवाजी का राष्ट्रप्रेम

वीर शिवाजी भारत के राजाओं की आपसी वैमनस्य से दुखी थे। वह चाहते थे कि भारत के सभी हिन्दू शासक एक हो जाए ताकि विदेशी शक्ति को भारत से खदेड़ा जाए। वीर शिवाजी ने कहा था कि यह विदेशी ताकतें भारत की संस्कृति को बरबाद कर रही है और भारतीय सम्पत्ति को लूट रही हैं। उन्होंने बार बार सभी राजाओं को एक साथ आने को कहा। वे मेवाडियों से दोस्ती के पक्षधर थे। ताकि विदेशी ताकतें भारत से बाहर हो जाए। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया यही कारण था कि भारत मुगलों के चुंगल से निकलने बाद अंग्रेजों के चुंगल में फंस गया। वीर शिवाजी भारतीय भाषा संस्कृत और मराठी के प्रेमी थी। वह फारसी भाषा को भारतीय संस्कृति को नष्ट करने वाली बताते थे। 

शिवाजी की युद्ध नीति

वीर शिवाजी ने ही गोरिल्ला युद्ध या छापामार युद्ध की शुरुआत की थी। यह युद्ध नीति दुश्मन का संपूर्ण दमन करने वाली थी। इस युद्ध नीति का वर्णन शिवाजी के समय में रचित ‘शिवसूत्र’ में किया गया है।

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