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सिंधु घाटी सभ्यता

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सिंधु घाटी सभ्यता। सिंधु घाटी सभ्यता मानव इतिहास की एक लंबी कहानी है। यही से भारतीय इतिहास प्रारम्भ होता है। सिंधु नदी घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता मिस्र, मेसोपोटामिया, भारत और चीन की चार सबसे बड़ी प्राचीन नगरीय सभ्यताओं में से सबसे अधिक विकसित थी। रेडियो कार्बन 14 जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति द्वारा सिंधु सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2500 ईसा पूर्व से 1750 ईसा पूर्व निर्धारित की गई है। यह सभ्यता दक्षिण एशिया के पश्चिमी भाग में फैली हुई थी अब यह भाग वर्तमान में पाकिस्तान तथा पश्चिमी भारत के नाम से जाना जाता है। इस सभ्यता का सबसे उत्तरी स्थल चिनाब नदी के किनारे मांडा है इसका दक्षिणी स्थल गोदावरी नदी के किनारे दैमाबाद है इसका पूर्वी स्थल हिंडन नदी के किनारे आलमगीरपुर है जबकि पश्चिमी स्थल दाश्क नदी के किनारे सुतकांगेदोर है।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग बहुत सभ्य थे। वह ईंटों के बने घरों में रहते थे। वह जहाज सम्बन्धी सामान भी बनाते थे। व्यापार के लिए वस्तु विनिमय का प्रयोग करते थे। उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से पता चला है कि यह लोग बहुत बुद्धिमान थे। इन्होंने रहने के लिए नगरों का निर्माण किया। इनकी नगर योजन प्रणाली और जल निकास प्रणाली पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है यहां के लोग दूर दूर तक व्यापार करने जाते थे और यहां पर अन्य देशों से भी व्यापार करने आते थे। सिंधु सभ्यता के लोग ज्योतिष, गणित और धर्म पर अच्छी समझ रखते थे। यातायात साधन के लिए यह लोग बैलगाड़ी का प्रयोग करते थे। सिंधु घाटी सभ्यता का निर्माता द्रविड़ और भूमध्य सागरीय प्रजाति को माना जाता है।

सिंधु सभ्यता का नामकरण

सिंधु सभ्यता की खोज 1921 में पुरातत्वविद रायबहादुर दयाराम साहनी ने की थी। दयाराम साहनी ने सबसे पहले पाकिस्तान में हड़प्पा स्थल की खोज की। अतः इसे हड़प्पा सभ्यता कहा गया। हड़प्पा सभ्यता सिंधु नदी और इसकी सहायक नदी के आसपास बसी थी अतः इसे सिंधु नदी घाटी सभ्यता कहा गया। सिंधु सभ्यता के लोगों ने ताँबे में टिन मिलाकर कांसा तैयार किया अतः इसे कांस्य युगीन सभ्यता भी कहा गया। प्रारम्भ में इसके अधिकतर स्थल की खोज सिंधु नदी के आसपास की गई अतः इसे सिंधु सभ्यता कहना उचित था।

भारत विभाजन के बाद इस सभ्यता से जुड़ी 1400 बस्तियों खोजी जा चुकी है। इनमें से 925 बस्तियों का केंद्र भारत में है। 1100 बस्तियां सरस्वती और उसकी सहायक नदियों के आसपास खोजी जा चुकी हैं। अतः इसे सरस्वती सभ्यता भी कहना उचित होगा। अब यह सरस्वती नदी लुप्त हो चुकी है।

सिंधु घाटी सभ्यता को तीन चरणों में बांटा गया है

  • प्रारम्भिक हड़प्पा सभ्यता (3300 ईसा पूर्व से 2600 ईसा पूर्व तक)
  • परिपक्व हड़प्पा सभ्यता (2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व तक)
  • उत्तर हड़प्पा सभ्यता (1900 ईसा पूर्व से 1300 ईसा पूर्व तक)

नगर योजना प्रणाली

जानिए सिंधु घाटी सभ्यता का इतिहास। सिंधु सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता उसकी नगर योजना प्रणाली और जल निकास प्रणाली थी। उसने नगर को इस तरह बसाया था कि आज के युग में इसकी कल्पना करना असंभव है। यानिके हमारे पूर्वज बहुत बुद्धिमान थे। उनकी नगर योजना प्रणाली ग्रिड पद्धति पर आधारित थी। सिंधु सभ्यता के लोगों ने सड़कों का तानाबाना ऐसे बुना कि सड़के एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।

सिंधु सभ्यता में प्रत्येक नगर को दो भागों में बांट दिया गया पूर्वी टीले और पश्चिमी टीले, जो पूर्वी टीले थे उसमें नगर या आवास के साक्ष्य मिले हैं पश्चिमी टीले पर दुर्ग के साक्ष्य मिले हैं। चन्हुदड़ो ही एकमात्र ऐसा नगर था जो दुर्गीकृत नहीं था। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के घर पक्की ईंटों के बने थे इससे अनुमान लगाया जाता है कि यह समृद्ध नगर थे। इसके विपरीत कालीबंगन और रंगपुर में घर कच्ची ईंटों के बने थे। पिग्गट ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को सिंधु सभ्यता की दो जुड़वा राजधानी बताया।

नगरों में प्रवेश के लिए चहारदीवारी हुआ करती थी। चहारदीवारी में भी प्रवेश द्वार होते थे। नगर की रक्षा के लिए नगर के चारों तरफ दीवार बनाई जाती थी। सिंधु सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता के मकानों के बीच एक आँगन होता था। मकान छोटे – बड़े होते थे। मकान में ही रसोईघर और स्नानघर होता था। ज्यादातर घरों में कुएँ थे। कालीबंगन के मकानों के फर्श में पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया है।

मकानों की ईंटों का आकार आयताकार था। इनकी लंबाई, चौड़ाई और मोटाई का अनुपात 4:2:1 था। घरों से गन्दा पानी मोरियों द्वारा बाहर आता था। मोरियां और नालियां ईंट–पत्थर द्वारा ढंकी होती थीं। मोहनजोदड़ो से एक सार्वजनिक स्थल विशाल स्नानागार मिला है। जैसे आज हम गंगा में धार्मिक अनुष्ठान के लिए स्नान करते हैं, उसी प्रकार विशाल स्नानागार का प्रयोग धार्मिक अनुष्ठान हेतु स्नान के लिए होता था। मार्शल ने इसे तत्कालीन विश्व का एक आश्चर्यजनक निर्माण बताया।

सिंधु सभ्यता में घरों के दरवाजे और खिड़कियां मुख्य सड़क की ओर न खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलते थे। लोथल एकमात्र ऐसा नगर था जिसके दरवाजे और खिड़कियां मुख्य सड़क की ओर खुलते थे। कुछ मकानों के निर्माण में चूना और जिप्सम का प्रयोग किया गया है।

राजनीति जीवन

सिंधु सभ्यता के विकास को देखकर पता चलता है कि यहां कोई राजनीतिक संगठन होगा। सिंधु सभ्यता का प्रशासनिक कार्य उसके हाथों में केन्द्रित होगा। सिंधु सभ्यता के लोग जो व्यापार करते थे उसमें भी  राजनीतिक भूमिका रही होगी। दुर्भाग्यवश इसके कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले। न ही यह पता चला कि सिंधु सभ्यता में लोकतंत्र था या राजतंत्र। सिंधु सभ्यता के लोग व्यापार की ओर ज्यादा आकर्षित थे। अतः सिंधु सभ्यता का शासन वणिक वर्गों के हाथों में था।

सामाजिक जीवन

सिंधु सभ्यता के लोगों का सामाजिक जीवन समृद्ध था। सामाजिक जीवन की मुख्य इकाई परिवार थी। यहां लोग अनेक वर्गों में विभाजित थे। जैसे पुरोहित, व्यापारी, अधिकारी, जुलाहे, मजदूर। सिंधु सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता में इन लोगों को रहने के लिए अलग अलग स्थान दिया गया था। जैसे पुरोहित, अधिकारी और व्यापारी नगर के अंदर रहते थे मजदूर और जुलाहे नगर से बाहर बस्तियों में रहते थे।

नारी की मृण्णमूर्ति अधिक मिलने से हड़प्पा समाज मातृप्रधान था। लोथल से तीन युगल शवधान कालीबंगन से एक युगल शवधान मिलने से सिंधु सभ्यता में सती प्रथा का भी प्रचलन था। मकानों की संरचना के आधार पर सिंधु सभ्यता में दास प्रथा का अनुमान लगाया जाता है।

आर्थिक जीवन

सिंधु सभ्यता का मुख्य व्यवसाय कृषि था। उस समय भूमि अधिक उपजाऊ थी। लोग सुख सुविधा से परिपूर्ण थे। प्राकृतिक पेड़ पौधों की भरमार थी। मानसूनी वर्षा अच्छी होती थी। जिससे पैदावार ज्यादा होती थीं। सिंधु सभ्यता में प्रति वर्ष बाढ़ आती थी। यहां के लोग बाढ़ उतर जाने पर नवंबर के महीने में बीज बो देते थे। बाढ़ आने से पहले अप्रैल के महीने में फसल काट लेते थे। मुख्यतः गेहूँ, चावल, जौ, मटर, राई, दाल और ज्वार उगाते थे। सिंधु सभ्यता से फावड़ा का साक्ष्य तो नहीं मिला लेकिन कालीबंगा से हल रेखाएं मिली हैं। इससे सिद्ध होता है कि सिंधु सभ्यता के लोग हल से खेत जोतते थे। सिंधु सभ्यता के लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों थे। ये भोजन में गेहूँ, चावल, दाल, गाय, भेड़, बकरी खाते थे। शिकार, पाशा, जानवरों की लड़ाई और नाच गाना मनोरंजन के मुख्य साधन थे। महिला और पुरुष दोनों आभूषण का प्रयोग करते थे। आभूषण सोना, चांदी, ताँबा, हाथी दाँत और सीप के बने होते थे। ताँबा राजस्थान के खेतड़ी से मंगाया जाता था। सोना दक्षिण भारत से मंगाया जाता था। चांदी ईरान, अफगानिस्तान और मेसोपोटामिया से आयात की जाती थी। पहली बार चांदी का प्रयोग सिंधु सभ्यता में ही किया गया था।

सिंधु सभ्यता के लोगों ने ही सर्वप्रथम कपास की खेती की। यूनान में इसे सिन्डन कहते हैं। सिंधु सभ्यता के लोग पशुपालन करते थे। पशुपालन हड़प्पा सभ्यता के लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय था। वह गाय, भेड़, बकरी, कुत्ता, सुअर आदि पालते थे घोड़े के अस्थि पंजर केवल सुरकोतदा से मिले हैं।

सिंधु सभ्यता के लोगों के अन्य देशों के साथ व्यापारिक संबंध थे। सिंधु सभ्यता के लोग व्यापार में वस्तु विनिमय का प्रयोग करते थे। यानिके वस्तु के बदले वस्तु ली जाती थी। सुमेर से पाये गए एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि सुमेर के व्यापारी मेलुहा के लोगों के साथ वस्तु विनिमय द्वारा व्यापार करते थे। यहां मेलुहा का अर्थ सिंधु प्रदेश से है। वस्तु विनिमय में बाट का प्रयोग किया जाता था। ये लोग घोड़े और लोहे से परिचित नहीं थे। ये उधोग धन्धों में निपुण थे। ये सूती और ऊनी दोनों वस्रों का निर्माण करते थे। 

धार्मिक जीवन

सिंधु सभ्यता की खुदाई से नारी की मृण्णमूर्ती अधिक संख्या में मिली है। जिससे ज्ञात होता है कि सैन्धव समाज मातृ देवी की पूजा करता था। सिंधु सभ्यता की खुदाई से नारी की एक ऐसी मूर्ति भी मिली है जिसमें नारी के गृभ से एक पौधा निकला हुआ है इससे ज्ञात होता है कि। यह पृृथ्वी को उर्वरता की देवी मानता था और उसकी पूजा करता था। सिंधु सभ्यता में कुबड़वाला सांड पूजनीय था।

सिंधु सभ्यता से प्राप्त एक सील पर पद्मासन की मुद्रा में तीन मुख वाला योगी ध्यान की मुद्रा में बैठा है। इसके एक तरफ हाथी, एक तरफ बाघ, एक तरफ गैंडा और पीछे भैंसा विराजमान है इन्हें आदि शिव माना गया है। सिंधु सभ्यता में वृक्ष, पशु, लिंग, योनि की पूजा भी की जाती थी। स्वस्तिक चिन्ह सिंधु सभ्यता की देन। सिंधु सभ्यता के लोगों का धार्मिक दृष्टिकोण का आधार इहलौकिक था। दुर्भाग्यवश सिंधु सभ्यता से मंदिर के साक्ष्य नहीं मिले हैं।

लिपि

सिंधु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक थी। यह लिपि दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी। सिंधु सभ्यता की लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी।

सिंधु सभ्यता का पतन

सिंधु सभ्यता का पतन 1800 ई. पू. के आसपास हो गया था। सिंधु सभ्यता के पतन के संबंध में अभी तक कोई सटीक कारण ज्ञात नहीं किया जा सका। कहा जाता है कि आर्यों के आक्रमण से सिंधु घाटी सभ्यता का पतन हुआ। एक अनुमान के आधार पर विद्वानों ने सिंधु सभ्यता के पतन का कारण जलवायु परिवर्तन माना। जबकि कुछ विद्वान मानते हैं कि सिंधु सभ्यता के पतन का कारण बाढ़ था। कुछ विद्वान ने माना सिंधु सभ्यता के पतन का कारण भूकम्प था।

सिंधु सभ्यता के प्रमुख स्थल

  • हड़प्पा यह हड़प्पा स्थल पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के मांटगोमरी जिले में रावी नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी ने की थी। यह एक अर्ध-औद्योगिक नगरी थी। हड़प्पा की मुहरों पर सबसे अधिक एक श्रंगी पशु का अंकन मिलता है। यहाँ से अन्नागार, बैलगाड़ी, पत्थर की बनी मूर्ति के साक्ष्य मिले हैं।
  • मोहनजोदड़ो सिंधी में इसका शाब्दिक अर्थ है मृतकों का टीला। यह पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाने जिले में सिंधु नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज 1922 ई. में राखालदास बनर्जी ने की थी। मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल स्नानागार तत्कालीन विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण है। यहाँ से प्राप्त अन्नागार सिंधु सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत है। यहाँ से नर्तकी की एक कांस्य मूर्ति मिली है।
  • चन्हूदड़ो यह पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में सिंधु नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज 1931 ई. में एम. जी. मजूमदार ने की थी। यहाँ मनके बनाने का कारखाना मिला। यहाँ से बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पैरों के निशान मिले हैं।चन्हुदड़ो ही एकमात्र ऐसा नगर था जो दुर्गीकृत नहीं था।
  • लोथल यह गुजरात के अहमदाबाद जिले में साबरमती नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज 1953 ई. में डॉ. एस. आर. राव ने की थी। लोथल का शाब्दिक अर्थ है मृत मानवों का नगर।यह सिंधु सभ्यता का महत्वपूर्ण बंदरगाह था। लोथल से चावल के साक्ष्य मिले हैं। लोथल से गोदीवाड़ा के साक्ष्य भी मिले हैं।
  • कालीबंगन कालीबंगन का शाब्दिक अर्थ है काली रंग की चूड़ियां। यह राजस्थान के गंगानगर जिले में घग्घर नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज 1953 ई. में ए. घोष ने की थी। कालीबंगन के घरों का निर्माण कच्ची ईंटों से किया गया था।यहाँ से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं। यहाँ से मिट्टी के बर्तन, मुहरे, अग्निकुंड और नक्काशीदार ईंटों का प्रयोग आदि पाये गए हैं।

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