वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता

वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता

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अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता

वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद इस सभ्यता का जन्म हुआ। इस सभ्यता के बारे में जानकारी हमें वेदों से मिलती है इसलिए इसे वैदिक सभ्यता कहते हैं तथा इस कालखंड को वैदिक काल कहते हैं। आर्य इस सभ्यता के निर्माता थे। वैदिक सभ्यता को दो भागों में बांटा गया है: ऋग्वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल। ऋग्वैदिक काल की जानकारी हमें ऋग्वेद से मिलती है। उत्तर वैदिक काल जानकारी के स्रोत यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, अरण्य और ब्राह्मण ग्रन्थ है।

  • सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद भारत की भूमि पर जिस नई सभ्यता का जन्म हुआ वह आर्य सभ्यता अथवा वैदिक सभ्यता थी।
  • इस सभ्यता के बारे में जानकारी हमें वेदों, आरण्यों और ब्राह्मण ग्रन्थों से मिलती है, जिसमें ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन होने के कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यही वह समय था जब ऋग्वेद की रचना की हुई।
  • वैदिक सभ्यता के निर्माता आर्य थे। इसलिए इसे आर्य सभ्यता भी कहते हैं।
  • आर्य एक संस्कृत भाषा का शब्द है। आर्य का अर्थ है श्रेष्ठ, उत्तम, कुलीन और अभिजात्य।
  • सिंधु घाटी सभ्यता के विपरीत आर्य सभ्यता मूलतः ग्रामीण थी।
  • माना जाता है कि आर्य लोग बाहर से आए थे। इन्होंने ही आक्रमण करके सिंधु सभ्यता का अंत किया है। आर्य लोगों ने एक नई सभ्यता विकसित की जो ग्रामीण सभ्यता कहलाई। और इनके द्वारा निर्मित सभ्यता वैदिक सभ्यता थी।
  • आर्य लोग घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इसलिए इन्होंने अपने पीछे कोई ठोस अवशेष नहीं छोड़े।
  • ये लोगों बुद्धिमान थे। इन्होंने नए नए औजारों का निर्माण किया। इन औजारों से जंगल, भूमि को साफ किया और जमीन को उपजाऊ बनाया और कृषि करने लगे। आर्य लोगों की संस्कृति सिंधु घाटी सभ्यता के विपरित थी। 

वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता का मूल निवास स्थान

  • आर्यों के मूल निवास स्थान को लेकर विद्वान में मतभेद है। विद्वानों ने आर्यों के मूल निवास स्थान अलग अलग बताये।
  • कुछ विद्वान मानते हैं कि आर्यों का मूल निवास स्थान सप्त सैंधव प्रदेश था। ऋग्वेद में भी इस बात का जिक्र किया गया है। 
  • ऋग्वेद में असुर और देवता के युद्ध का वर्णन है जिसमें असुर पराजित होते हैं तथा असुर सप्त सैंधव छोड़कर ईरान चले जाते हैं। ईरानी ग्रन्थ ‘जिंद अवेस्ता‘ में कुछ बाते ऋग्वेद से मिलती-जुलती है।
  • ईरानी ग्रन्थ जिंदा अवेस्ता में जिस अहुरमजदा का वर्णन है वह असुरों का देवता था।
  • विद्वान् मैक्स मूलर ने आर्यों का मूल निवास स्थान मध्य एशिया माना।
  • ऐसा माना जाता है कि प्राचीन समय में हिन्द – यूरोपीय एक ही भाषा बोलते थे। क्योंकि कुछ जंगली जानवर जैसा: कुत्ता, घोड़ा और कुछ पेड़ों के नाम जैसे: देवदारु, मैपिल आदि नामों में समानता पाई जाती है।  

वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता का समय

  • कुछ विद्वान मानते हैं कि आर्य बाहर से आए थे। इन विद्वानों ने आर्यों का समय 1500 ईसा पूर्व निर्धारित किया।
  • इसी के आसपास 1000 ईसा पूर्व में ऋग्वेद की रचना की गई। अगर देखा जाए तो आर्य भारत में 1500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के आसपास बसे। यही समय सर्वाधिक मान्य  है।
  • जर्मन विद्वान मैक्स मूलर मानते हैं कि आर्य भारत में 1200 ईसा पूर्व में आकर बसे।
  • पश्चिमी एशिया में बोगाजकोई से एक अभिलेख मिला। जो 1400 ईसा पूर्व का है। इस अभिलेख में हिती राजा शुब्बिलिम्मा और मितन्नी राजा मतिऊअजा के बीच संधि का उल्लेख है।
  • इस संधि की रक्षा के लिए देवताओं को साक्षी बनाया गया है। इसमें हिन्दू देवता इन्द्र, मित्र, वरुण, नासत्य का उल्लेख है।
  • इस आधार पर देखा जाए तो आर्य का काल 1400 ईसा पूर्व से कुछ पहले माना जाता है। 

वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता को दो कालखंड में बांटा गया है

  1. ऋग्वैदिक काल (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.)
  2. उत्तर वैदिक काल (1000 ई.पू. से 600 ई.पू.)

वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता

ऋग्वैदिक काल

स्त्रोत

ऋग्वैदिक काल के बारे जानकारी हमें ऋग्वेद से मिलती है। वैदिक सभ्यता का यह प्रारम्भिक काल था। इसलिए ऋग्वेद इस काल के लिए सर्वाधिक मान्य ग्रंथ है। इसके के रचयिता महर्षि वेदव्यास जी है।

  • ऋग्वैदिक काल सिंधु सभ्यता के पतन के बाद का काल है। इसमें कर्मकांड की प्रधानता नहीं थीं।
  • आगे चलकर उत्तर वैदिक काल में कर्मकांड की प्रधानता में वृद्धि हुई है।
  • इसमें जाति व्यवस्था कर्म पर आधारित थी।
  • ऋग्वैदिक काल के इतिहास के बारे में जानकारी मुख्यतः ऋग्वेद से मिलती है।
  • यह विश्व का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है।
  • ऋग्वेद के मंत्रों से देवताओं का आहवान किया जाता था।
  • इसमें 10 मण्डल, 1028 सूक्ति और 10462 ऋचाएं हैं।
  • इसका तीसरा मण्डल सूर्य देवता सावित्री को समर्पित है।
  • सातवां मंडल में दासराज्ञ युद्ध का वर्णन है जो भरत वंश के मध्य लड़ा गया। इस युद्ध में आर्य और अनार्य शामिल थे। 

भौगोलिक विस्तार

  • आर्य सर्वप्रथम सप्त सैंधव क्षेत्र में आकर बसे। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी किया गया है।
  • इस सप्त सैंधव में सात नदियां बहती थी। इन सात नदियों का नाम सिंधु, सरस्वती, परुष्णी (रावी), विपाशा (व्यास), शतुद्री (सतलज), वितस्ता (झेलम), अस्किनी (चिनाब) हैं। 
  • ऋग्वेद में अफगानिस्तान की चार नदियों का भी उल्लेख है। जिनका नाम क्रुमु (कुर्रम), गोमती (गोमल), कुभा (काबुल) और सुवास्तु (स्वात) हैं।
  • अतः आर्य सर्वप्रथम पंजाब व अफगानिस्तान में बसे थे।
  • आर्य हिमालय की चोटी मूजवंत से परिचित थे। यही से वह पेय पदार्थ सोम रस प्राप्त करते थे।
  • आर्य कई नदियों से परिचित थे। सरस्वती नदी आर्य सभ्यता की सबसे पवित्र नदी थी।
  • इसे नदियों में श्रेष्ठ कहा गया है। इसे नदीत्तम भी कहा गया है। आज यह नदी लुप्त हो चुकी है।
  • ऋग्वेद में सिंधु नदी का सर्वाधिक बार उल्लेख है। यह आर्यों की सबसे प्रमुख नदी थी।
  • इसे सुषोमा भी कहा गया है। क्योंकि यह सुषोमा पर्वत से निकलती है।
  • आज की पवित्र नदी गंगा का उल्लेख ऋग्वेद में एक बार किया गया है। यमुना का तीन बार उल्लेख है।
  • ऋग्वेद में नदियों की संख्या 25 बताई गई हैं।

सामाजिक जीवन

  • आर्य समाज की मूल इकाई परिवार या कुल थी।
  • कुल का प्रधान पिता था। कुल या गृह का प्रधान कुलपति या गृहपति कहलाता था।
  • आर्य समाज पितृसत्तात्मक था। पिता की संपत्ति पर पुत्र का अधिकार था। 
  • आर्यों की भाषा संस्कृत थी।
  • ऋग्वेदिक काल में स्त्री की स्थिति थोड़ी अच्छी थी। वह अपने पति के साथ धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेती थी।
  • स्त्री का उपनयन संस्कार होता था। उसे शिक्षा का अधिकार था।
  • ऋग्वेद में कुछ विदुषी महिला का उल्लेख है जैसे: लोपामुद्रा, घोषा, सिकता, विश्चरा आदि।
  • इन महिलाओं ने ऋग्वेद की ऋचाओं की रचना की हैं।
  • ऋग्वैदिक काल में अंतर्जातीय और पुनर्विवाह होते थे। स्त्री अपने देवर से विवाह कर सकती थीं। जो कन्याएं जीवन भर कुंवारी रहती थी। वह अमाजू कहलाती थी।
  • ऋग्वैदिक काल में स्त्री का पिता की सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं था।
  • समाज में नियोगी प्रथा प्रचलित थी। सती प्रथा और पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था। 
  • ऋग्वेदिक काल में वर्ण व्यवस्था की नींव पड़ चुकी थी जो आगे चलकर उत्तर वैदिक काल में मजबूत हो गई।
  • ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में चार वर्ण का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में बताया गया है कि विराट पुरुष से ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय भुजा से, वैश्य जांघ से और शूद्र पैर से उत्पन्न हुआ है। शूद्र शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में है।
  • ऋग्वेदिक काल में वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी। 
  • आर्य मांसाहारी और शाकाहारी दोनों थे। वह पेय पदार्थ के रूप में सोमरस का प्रयोग करते थे। सुरा पान वर्जित था।
  • आर्य वास, अधिवास और नीवी वस्त्र पहनते थे। पुरुष सिर पर पगड़ी धारण करते थे।
  • घुड़दौड़, पासा, नृत्य, संगीत मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।
  • समाज में स्त्री और पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे। आभूषण सोने-तांबे के बने होते थे।

राजनीतिक जीवन

  • ऋग्वेदिक काल में प्रशासन की सबसे छोटी इकाई कुल थी।
  • कई कुल मिलकर ग्राम का निर्माण करते थे ग्राम का मुखिया ग्रामणी कहलाता था।
  • कई ग्राम विश का निर्माण करते थे। विश का प्रधान विशपति कहलाता था।
  • कई विश जन बनाते थे। जन का प्रधान राजा होता था।
  • कई जन राष्ट्र का निर्माण करते थे। राष्ट्र का प्रधान सम्राट कहलाता था। राजा को जनस्य गोपा कहा गया है। यानिके कबीले का संरक्षक।
  • ऋग्वैदिक काल में राजा का पद अनुवांशिक होता था। लेकिन वह निरंकुश नहीं था।
  • ऋग्वैदिक काल में कई कबीलाई परिषद् थी जो सैनिक और धार्मिक कार्य करती थी‌। इनमें समिति, सभा और गण प्रमुख परिषद् थी।
  • समिति जो लोगों की आम सभा थी अपने राजा को चुनती थी। समिति के अध्यक्ष को ईशान कहा जाता था। ऋग्वेद में इसका 9 बार उल्लेख किया गया है।
  • इसकी तुलना आधुनिक लोकसभा से की गई है।
  • सभा श्रेष्ट लोगों की संस्था थी। यह संसद के रूप में कार्य करती थी। यह सैनिक, धार्मिक और सामाजिक कार्यों पर वाद – विवाद करती थी और राज्य के कामकाज को निपटाती थी।
  • सभा का अध्यक्ष सभापति होता था। इसकी तुलना आधुनिक राज्यसभा से की गई है। ऋग्वेद में इसका 8 बार उल्लेख किया गया है।
  • सभा और समिति में स्त्री की भागीदारी थीं।
  • वैदिक काल की सबसे प्राचीन संस्था विदथ थी। विदथ का उल्लेख ऋग्वेद में 122 बार है। यह अति प्राचीन जनसभा थी। यह धार्मिक, सैनिक और सामाजिक विषय पर चर्चा करती थी।
  • ऋग्वैदिक काल में गण कुलीन लोगों की सभा थी। इसके मुखिया को गणपति कहा जाता था।
  • ऋग्वेद में जन का उल्लेख 275 बार है।
  • विश शब्द का उल्लेख 170 बार है।
  • ऋग्वेद में जनपद का उल्लेख नहीं मिलता।
  • प्रजा अपने राजा को स्वेछा से कर देती थी। इसे बलि कहा जाता था। बलि के रूप में जौ, यव दिया जाता था। बदले में राजा प्रजा की रक्षा, पशुधन की रक्षा और युद्ध का नेतृत्व करता था।
  • राजा के पास कोई स्थायी सेना नहीं थी। आम लोग ही युद्ध के समय इसमें शामिल होते थे।
  • ज्यादातर युद्ध गाय के लिये लड़े जाते थे।
  • वैदिक काल में राजा भूमि मालिक नहीं बल्कि युद्ध का स्वामी होता था। व्रात, सार्ध और गण सैनिक इकाईयां थीं।
  • सेनानी, सूतकार, रथकार, कर्मार रत्नि कहे जाते थे। कुल बारह रत्नी थे। ये बारह रत्नि थे पुरोहित, सेनानी, युवराज, महिषी, सूत, ग्रामणी, संग्रहीता, क्षत्ता, भागदुध, अक्षवाप, पालागल। यह राजा के राज्यभिषेक के समय उपस्थित होते थे।
  • राजा के पास आधुनिक शासन की तरह अधिकारी होते थे। जिनमें पुरोहित, सेनानी, कर्मार और ग्रामणी शामिल थे।
  • पुरोहित का पद सर्वोच्च था। पुरोहित न्यायिक कार्यों में भाग लेता था वह राजा का दार्शनिक था।
  • दसराज्ञ युद्ध का कारण पुरोहित को उसके पद से हटाना था। जब भरत वंश के राजा सुदास अपने पुरोहित विश्वामित्र को हटाकर वशिष्ठ को नियुक्त करते हैं तब विश्वामित्र दस जनों के राजा को इकठ्ठा कर युद्ध का आह्वान करता है। कालान्तर में यह युद्ध दासराज्ञ युद्ध कहलाता है।
  • युद्ध परुष्णी नदी के तट पर भरत वंश के राजा सुदास और दस जनों के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में दोनों तरफ आर्य-अनार्य शामिल थे। इस युद्ध में सुदास विजय हुए। पराजित जनों में सबसे प्रमुख पुरु थे। भरत और पुरु के बीच मैत्री के बाद नया कुल कुरु बना। ऋग्वेद के सातवें मंडल में इस युद्ध का उल्लेख किया गया है।
  • राष्ट्र में अनेक जन थे इन जनों में पंचजन अनु, यदु, द्रयु, तुर्वस एवं पुरु प्रसिद्ध थे अन्य जन भारत, त्रित्सु, सुंजय, त्रिवि थे। जन विश में विभक्त थे।
  • ऋग्वैदिक काल में राजा के पास गुप्तचर होते थे। यह जनता की गतिविधियों पर नजर रखते थे। इन्हें ऋग्वेद में स्पश कहा गया है।
  • व्राजपति गोचर भूमि का स्वामी होता था।
  • ऋग्वेद में उग्र शब्द का उल्लेख मिलता है। यह एक पुलिस कर्मचारी था इसका काम अपराधी को पकड़ना था।

आर्थिक जीवन

  • ऋग्वैदिक आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन और कृषि उनका गोण धंधा था।
  • आर्यों के लिए गाय पशुधन था। आर्यों की ज्यादातर लड़ाइयां गायों के लिए लड़ी गई।
  • ऋग्वेद में गाय के लिए गविष्टि (गाय की खोज) युद्ध का पर्याय माना जाता था। वैदिक काल में गाय को अघन्या ( ना मारने योग्य माना गया) माना गया है।
  • ऋग्वैदिक काल में पुत्री को दुहिता कहा गया है यानिके गाय दुहने वाली।
  • वैदिक काल में घोड़ा दूसरा अति उपयोगी पशु था। इसका प्रयोग युद्ध में रथों को खींचने में किया जाता था। ऋग्वेद में अन्य पशु गाय, भेड़, बकरी, हाथी, ऊंट, कुत्ता और बैल है। बैलों का प्रयोग हल में किया जाता था।
  • हल से खेती की जाती थी। हल में 6,8,12 तक बैल जोड़े जाते थे।
  • ऋग्वेद में फाल का उल्लेख मिलता है।
  • ऋग्वेद में कृषि का 24 बार उल्लेख है। ऋग्वेद का चौथा मंडल कृषि को समर्पित है।
  • ऋग्वेद में उल्लेखित धातुओं में सर्वप्रथम तांबा है। तांबा को अयस कहा गया है। आर्यों को लोहा, चांदी का ज्ञान नहीं था।
  • ऋग्वेद में समुद्र का उल्लेख तो मिलता है। लेकिन इससे आर्यों के विदेशी व्यापार के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती।
  • ऋग्वेद में आख्यान है कि जब भुज्यु समुद्री यात्रा करते हैं तो मार्ग में उनका जलयान डूब जाता है तब वह भगवान अश्विनी कुमार से प्रार्थना करते हैं। अश्विनी कुमार उनकी रक्षा के लिए सौ पतवार वाली एक नाव भेजते हैं।
  • व्यापार पणि लोगों के हाथों में था। ऋग्वेद में प्रमुख शिल्पियों के नाम बढ़ई (तक्षा), धातुकर्मी (कर्मार), स्वर्णकार, बुनकर आदि हैं। बढ़ई शिल्पियों का मुखिया होता था। पणि ऋणदाता थे। यह अत्यधिक ब्याज पर ऋण देते थे। इन्हें (वेकनाट) सूदखोर कहा गया है।
  • सिंधु और गांधार ऊन के लिए प्रसिद्ध थे।
  • वस्तुओं पर कढ़ाई बुनाई औरते करती थी ऋग्वेद में इसके लिए पेशस्कारी शब्द का उल्लेख है। करघी को तसर कहा गया है।
  • ऋग्वेद में कपास का उल्लेख नहीं मिलता। वैद्य (भिषक), नर्तक – नर्तकी, नाई (वातृ) अन्य सामाजिक वर्ग थे।

धार्मिक जीवन

  • आर्य एकेश्वरवाद के साथ साथ बहुलवादी थे। वह प्राकृतिक शक्तियों के रूप में कई देवताओं को पूजा करते थे।
  • देवियों की अपेक्षा देवताओं का बोलबाला था।
  • आर्यों का प्रमुख देवता इन्द्र था। इन्द्र को पुरंदर कहा गया है। पुरंदर का अर्थ है दुर्ग को तोड़ने वाला। यह वर्षा का देवता था। ऋग्वेद में इन्द्र पर 250 सूक्त है।
  • दूसरा महत्वपूर्ण देवता अग्नि था। यह मानव और देवताओं के बीच मध्यस्थ का कार्य करता था। देवताओं की आहुतियां इसी के माध्यम से दी जाती थी। ऋग्वेद में अग्नि पर 200 सूक्त है।
  • तीसरा प्रमुख देवता वरुण था। यह जल का देवता था। इसे ऋतस्य गोपा कहा गया है यानिके ऋत का रक्षक कहा गया है।
  • ऐसा माना गया है कि संसार में सब कुछ उसी की इच्छा से होता है।
  • सोम वनस्पति का देवता था। ऋग्वेद का नौवां मंडल देवता सोम को समर्पित है।
  • मरूत आंधी का देवता था।
  • ऋग्वेदिक काल में पूषन को पशुओं का देवता माना जाता है। उत्तर वैदिक काल में यह शूद्र का देवता हो जाता है।
  • वैदिक काल में देवियों की संख्या कम थी। उषा उषाकाल की देवी थी। अदिति भी उषाकाल का प्रतिनिधि करती थी।
  • अरण्यनी जंगल की देवी थी।
  • वैदिक काल की प्रसिद्ध अप्सरा उर्वशी थी।
  • देवी देवताओं की अराधना स्तुति पाठ और यज्ञ आहुतियों से की जाती थी। यज्ञ आहुतियों में दूध, घी, अन्न आदि वस्तुएं दी जाती थी।
  • वैदिक काल में किसी मन्दिर और मूर्ति पूजा का उल्लेख नहीं मिलता।
  • आर्य आत्मवादी थे। यह आत्मा पर विश्वाश करते थे। पुनर्जन्म की भावना अभी विकसित नहीं हुई थी।
  • ऋग्वेद में अमरता का उल्लेख है।
  • आर्य देवी देवताओं की पूजा मोक्ष के लिए नहीं अपितु धन, पशु, स्वास्थय के लिए करते थे।
  • आर्यों की अराधना का उद्देश्य लौकिक था।

वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता

उत्तर वैदिक काल

स्रोत

ऋग्वैदिक काल के बाद के काल को उत्तर वैदिक काल कहा जाता है। इस काल के बारे जानकारी हमें यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, आरण्यों और ब्राह्मण ग्रन्थों से मिलती है। यहां यह ध्यान रहे कि वेदांग वैदिक साहित्य के अंतर्गत परिगणित नहीं होते।

भौगोलिक विस्तार

  • उत्तर वैदिक काल में आर्यों का गंडक नदी तक विस्तार हुआ। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार तक के क्षेत्र शामिल थे।
  • शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि विदेथ माधव ने पृथ्वी की रक्षा के लिए वैश्वानर अग्नि को मुंह में धारण किया। धृत का नाम सुनते ही वह अग्नि प्रथ्वी पर गिर गई। सब कुछ जलाती हुई पूर्व की ओर बढ़ी। पीछे पीछे माधव और उनका पुरोहित गौतम राहुगण चला पड़े परंतु वैश्वानर अग्नि गंडक नदी को नहीं जला पाई।
  • इस आख्यान से ज्ञात होता है कि आर्यों का सरस्वती क्षेत्र से पूर्व दिशा में गंडक नदी तक विस्तार था।
  • उत्तर वैदिक काल में पुरू और भरत मिलकर कुरु कहलाए और तुर्वश और क्रिवि मिलकर पांचाल कहलाए। इस काल में कुरु, पांचाल और विदेह प्रमुख राज्य बनकर उभरे।
  • कुरु की राजधानी आसंदीवत और पांचाल की राजधानी कांपिल्य थी। कैकय का राजा अश्वपति एक दार्शनिक था।

सामाजिक जीवन

  • इस काल में वर्ण व्यवस्था में कठोरता आ गई थी। वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित न होकर, जाति पर आधारित थी।
  • समाज में चार वर्ण थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। ब्राह्मण के लिए ऐहि, क्षत्रिय के लिए आगच्छ, वैश्य के लिए आद्रव, शूद्र के लिए आधव शब्द का प्रयोग किया गया है।
  • ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को द्विज कहा गया। इनका उपनयन संस्कार होता था। जबकि शूद्र उपनयन संस्कार के अधिकारी नहीं थे।
  • यज्ञ का महत्व बढ़ गया था। इससे ब्राह्मणों के अधिकारों में अपार वृद्धि हुई।
  • शूद्र को निम्न स्थान दिया गया। उसका कार्य लोगों की सेवा करना था।
  • उत्तर वैदिक काल में स्त्री की स्थिति निम्न थी। ऐतरेय ब्राह्मण में माना गया है कि स्त्री समस्त दुखों का कारण है। स्त्री पर समाज में कई तरह की पाबन्दी लगाई गई। उनका सभा और समिति में प्रवेश वर्जित कर दिया गया। स्त्री का उपनयन संस्कार भी नहीं होता था। समाज में बाल विवाह का प्रचलन था।
  • उत्तर वैदिक काल में गोत्र प्रथा चल पड़ी।
  • उत्तर वैदिक काल में भी कई विदुषी महिला के नाम मिलते हैं जैसे: गार्गी, मैत्रेयी, सुभला आदि।
  • शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि विदेथ माधव ने पृथ्वी की रक्षा के लिए वैश्वानर अग्नि को मुंह में धारण किया। और आर्य सभ्यता का सरस्वती क्षेत्र से पूर्व दिशा में गंडक नदी तक विस्तार किया।
  • उत्तर वैदिक काल में छान्दोग्य उपनिषद् में तीन आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रम का उल्लेख मिलता है।
  • सर्वप्रथम जाबालोपनिषद में चारों आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी आश्रम का उल्लेख है।

राजनीतिक जीवन

  • उत्तर वैदिक काल में राष्ट्र शब्द का पहली बार प्रयोग हुआ है। यह प्रदेश का सूचक माना गया।
  • आर्यों ने कई स्थाई राज्यों का गठन किया क्योंकि उत्तर वैदिक काल में कबीलाई संगठन कमजोर हो चुके थे। अब यह कबीले एक दूसरे में विलीन होकर बड़े क्षेत्रों में तब्दील हो गए थे।
  • जैसे पांचाल पहले कबीला था अब यह प्रदेश में परिवर्तित हो गया था। पहले जो जन थे वह भी एक दूसरे में विलीन हो गए जैसे पुरू और भरत मिलकर कुरु कहलाए, तुर्वश और क्रिवि मिलकर पांचाल कहलाए।
  • कुरु जो पहले एक क्षेत्र तक सीमित थे अब वह हस्तिनापुर पर शासन करते थे। पांचाल दिल्ली और मेरठ पर शासन करते थे।
  • कई शक्तिशाली शासकों का उदय हो चुका था। जैसे विदेह के जनक, काशी के अजातशत्रु, केकय के अश्वपति, पांचाल के प्रवाहण जैवलि, कुरु के उद्वलक आरुणि।
  • इस काल में शासन का स्वरूप राजतंत्रात्मक था। कुछ गणराज्य भी थे। जो आगे चलकर सोलह महाजनपद के रूप में सामने आए।
  • वैदिक काल में राजा के अधिकारों में अपार वृद्धि हुई। अब वह कबीले का नहीं बल्कि प्रदेश का शासक था।
  • वैदिक काल के राजा उपाधि धारण करने लगे थे। जैसे वह मध्य देश में राजा, पूर्व में सम्राट, पश्चिम में स्वराट्, उत्तर में विराट, दक्षिण में भोज और चारों दिशाओं को जीतने वाला एकराट् कहलाने लगा।
  • इससे राजा द्वारा साम्राज्य के विस्तार का अनुमान लगाया जाता है। यानिके वह साम्राज्य विस्तार के लिए शक्ति प्रदर्शन करते थे।
  • उत्तर वैदिक काल में वैदिक काल की सबसे प्राचीन संस्था विदथ समाप्त हो चुकी थी।
  • सभा और समिति जो ऋग्वैदिक काल में राजा के कार्यों पर चर्चा करती थी। और राजा का चुनाव करती थी अब उनका महत्व कम हो गया था। परंतु यह अभी भी राजा की निरंकुशता पर रोक लगती थी।
  • अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है। वैैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता

आर्थिक जीवन

  • उत्तर वैदिक काल में पशुपालन की जगह कृषि आर्यों का मुख्य पेशा थी।
  • उत्तर वैदिक काल में लोहे का प्रयोग किया जाने लगा। इससे कृषि के क्षेत्र में क्रांति आयी। 1000 ईसा पूर्व के आसपास लोहा उत्तर प्रदेश के ऐटा जिले के अन्तरंजीखेड़ा से प्राप्त हुआ।
  • हिन्दू ग्रन्थ शतपथ ब्राह्मण में जुताई, बुआई, कटाई और मुड़ाई कृषि की चारों क्रियाओं का उल्लेख है।
  • अब आर्यों की मुख्य फसल धान और गेहूं थी।
  • यजुर्वेद में चावल के लिए ब्रीहि, जौ के लिए यव, गेहूं के लिए गौधूम, उड़द के लिए माण शब्द का प्रयोग किया गया है।
  • सिंचाई नहरों – कुंओ से की जाती थी।उत्तर वैदिक काल में हल की नाली को सीता कहा गया है।
  • अथर्ववेद में बताया गया है कि पृथ्वीवेन ने ही हल और कृषि को जन्म दिया।
  • उत्तर वैदिक काल में हाथी का पालन शुरू हो गया था। हाथी के लिए हस्ति या वरण शब्द उल्लेख है।
  • ब्राह्मण ग्रन्थ में श्रेष्ठि और श्रेष्ठय शब्द मिलते हैं। इससे व्यापारियों की श्रेणी का अनुमान लगाया जाता है।
  • तैतरीय संहिता में ऋण के लिए कुसीद, शतपथ ब्राह्मण में महाजनी प्रथा का पहली बार उल्लेख हुआ है। इसमें सूदखोर को कुसीदिन कहा गया।
  • बाट की मूल इकाई रत्तिका थी। यह बाट की सबसे छोटी इकाई थी।
  • निष्क (सोने का सिक्का) जो ऋग्वैदिक काल में सोने का आभूषण थी अब वह माप की इकाई थी। शतमान (चांदी का सिक्का), पाद, कृष्णल माप की विभिन्न इकाइयां थी। द्रोण का प्रयोग अनाज मापने के लिए होता था।
  • उत्तर वैदिक काल में लाल मृदभांड, काला व लाल मृदभांड, काले पोलिशदार मृदभांड और चित्रित धूसर मृदभांड का प्रयोग किया जाता था। लाल मृदभांड का प्रयोग सबसे अधिक किया जाता था। चित्रित धूसर मृदभांड उत्तर वैदिक काल के विशिष्ट भांड थे।
  • उत्तर वैदिक काल में आर्य समुन्द्र से परिचित थे। इससे उनके विदेशी व्यापार का अनुमान लगाया जाता है।
  • व्यापार वस्तु विनिमय द्वारा ही होता था। सिक्कों का नियमित प्रचलन नहीं हुआ था।
  • इस काल में नगरों का उदय हुआ कोशांबी – हस्तिनापुर नगर आद् नगरीय स्थल थे।

धार्मिक जीवन

  • उत्तर वैदिक काल में आर्यों के धार्मिक जीवन में कई परिवर्तन आए जैसे:
  • देवताओं की महत्ता में परिवर्तन, अराधना की रीति में परिवर्तन तथा धार्मिक उद्देश्यों में परिवर्तन।
  • इंद्र के स्थान पर प्रजापति को सर्वोच्च स्थान मिला। अब यह आर्य के सर्वोच्च देवता थे।
  • रूद्र जो पशुओं के देवता थे अब शिव के रूप में पूजे जाने लगे। विष्णु भगवान को आर्य पालनहार के रूप में पूजने लगे।
  • पूषन ऋग्वैदिक काल में शूद्र के देवता थे अब वह पशुओं के देवता हो गए। वरुण मात्र जल के देवता माने जाने लगे।
  • उत्तर वैदिक काल में मूर्ति पूजा के संकेत मिलते हैं। परंतु मूर्ति पूजा का प्रचलन गुप्तकाल से माना जाता है।
  • ऋग्वैदिक काल के देवता इन्द्र और अग्नि का महत्व कम हो गया।
  • उत्तर वैदिक काल में यज्ञ का महत्व बढ़ गया था। यज्ञ में पशुओं की बलि दी जाने लगी। इससे पशुओं का ह्रास हुआ।
  • इस काल में वेदों के अपने अपने पुरोहित थे जैसे: ऋग्वेद के होता, सामवेद के उद्गाता, यजुर्वेद के अध्वर्यु, अथर्ववेद के ब्रह्मा
  • निष्काम कर्म के सिद्धांत का प्रतिपादन पहली बार ईषोपनिषद् में किया गया है।
  • मुंडकोपनिषद् में यज्ञ की तुलना टूटी नाव से की गई है।
  • मृत्यु की चर्चा सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण, मोक्ष की चर्चा उपनिषद् तथा पुनर्जन्म की अवधारणा वृहदराण्यक उपनिषद् में है।
  • उत्तर वैदिक काल में कई प्रकार के यज्ञ प्रचलित थे जैसे: अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ, वाजपेय यज्ञ आदि। इन्हें राजा द्वारा संपन्न किया जाता था।
  • इनमें अश्वमेध यज्ञ राजा द्वारा साम्राज्य विस्तार के लिए किया जाता था। इसमें सा और घोड़ों की बलि दी जाती थी। वाजपेय यज्ञ का आयोजन राजा शक्ति प्रदर्शन के लिए करता था। इसमें रथ की दौड़ होती थी। राजसूय यज्ञ राजा के राज्याभिषेक से सम्बन्धित था।

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Pankaj Bharat

पंकज भारत उत्तर प्रदेश से है। वे ज्ञानीभारत.com ब्लॉग साइट के जरिए उन लोगों को शिक्षित करना चाहते हैं जो महंगी कोचिंग और किताब के कारण शिक्षा से दूर है। वे इतिहास, इन्फॉर्मेशन, प्रेरणा, विचार, बायोग्राफी और GK विषय पर लिखते हैं।

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