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रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता

रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता ? नमस्कार दोस्तों, मैं पंकज भारत ज्ञानीभारत.com पर आपका स्वागत करता हूं। दोस्तों इस पोस्ट में मैं आपकों रक्षाबंधन क्या है और यह क्यों मनाया जाता है के बारे में बताने जा रहा हूं। दोस्तों जैसे की हम जानते हैं कि यह त्यौहार हिन्दुओं का एक पवित्र त्यौहार है।

इस त्यौहार पर बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है। यह भाई – बहन के अटूट प्रेम को दर्शाता है। यह त्यौहार प्रति वर्ष पूर्णिमा को मनाया जाने वाला त्यौहार है। तो दोस्तों आज मैं इसी के बारे में विस्तार से बताने जा रहा हूं।

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रक्षाबंधन क्या है?

रक्षाबंधन हिन्दुओं का एक पवित्र त्यौहार है। यह  त्यौहार प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रक्षाबंधन का मतलब होता है रक्षा अर्थात् सुरक्षा, बन्धन अर्थात् बाध्य यानिके इस दिन भाई अपनी बहनों को सुरक्षा का वचन देता है। यह त्योहार भाई बहनों के अटूट प्रेम को दर्शाता है। इस दिन बहने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती है। इस दिन राखी का हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। राखी सूत, रेशम, कलावा और धागे की बनी होती है। बाजारों में एक से बढ़कर एक महंगी राखी मिलती है। बहने जैसी चाहे वैसी राखी खरीद सकती है।

रक्षाबंधन के दिन बाजारों में बड़ी भीड़ भाड़ रहती है। पूरे बाजार राखी और मिठाइयों से भरे होते हैं। बाजारों में कई प्रकार की मिठाइयां होती है। चारों तरफ सड़कों पर वाहनों की आवाजाही लगी रहती है। सड़कों पर चलने वाली बसों में पैर रखने की भी जगह नहीं होती।

रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता

रक्षाबंधन के दिन घरों पर मेहमानों का आना जाना लगा रहता है। घर में पूरा परिवार एक साथ होता है। यह त्योहार रूटी बहनों को भी अपने भाई से मिलाता है। बहने अपने भाइयों के लिए बाजार से मिठाई खरीद कर लाती है और जब अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो मिठाई से उसका मुंह मीठा कराती है। इस दिन बहने भगवान से अपने भाइयों की सलामती के लिए दुआ मांगती है। और भाई अपनी बहन को सुरक्षा का वचन देता है। भाई के साथ साथ बहने पिता को भी राखी बांधती है।

रक्षा बंधन का त्यौहार का एक पवित्र त्योहार है इस दिन बहने अपने भाइयों के साथ साथ सरहद पर तैनात जवानों को भी राखी बांधने जाती है। यह त्यौहार रिश्तों की डोर को और मजबूत बनाता है।

रक्षाबंधन कैसे मनाया जाता है?

इस दिन बहने सुबह ही जल स्नान में स्नान करती है और भाई भी जल में स्नान कर साफ़ सुथरे कपड़े पहनते हैं। बहने रक्षाबंधन के दिन शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा करती है। जैसे ही शुभ मुहूर्त का समय होता है बहने एक थाली सजाती है। उस थाली में चावल, हल्दी, राखी, मिठाई और दिया होता है। बहन भाई के साथ उपयुक्त स्थान पर बैठती है। अब थाली में दिया जलाती है। फिर हल्दी या रोली से भाई का टीका करती है। फिर उसके माथे पर चावल के कुछ दाने लगाती है और उसकी आरती करती है।

फिर उसका मिष्ठान से मुंह मीठा कराती है। भाई जेब में हाथ डालता है और कुछ रुपए अपने पर्स से निकालता है। उन रुपयों को अपनी बहन की थाली में रखता है। रुपए के अलावा भाई अपनी बहनों को घड़ी, मोबाइल, गाड़ी और घर भी उपहार के रूप में देता है। बहन खुशी से भाई द्वारा दिए गए उपहार को ले लेती है। राखी बांधने के बाद घर में खाना बनाया जाता है। इस दिन बहने राखी बांधने तक अपने भाइयों के लिए व्रत रखती है। राखी बांधने के बाद पूरा परिवार मिलकर खाना खाता है।

2020 में रक्षाबंधन कब मनाया जाएगा?

2020 में रक्षाबंधन 3 अगस्त को मनाया जाएगा। रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता? इस दिन शुभ योग बन रहे हैं। क्योंकि इस बार 3 अगस्त को सावन का लास्ट सोमवार है और 3 अगस्त को पूर्णिमा भी पड़ रही है। इसलिए इस बार रक्षाबंधन शुभ रहने वाला है। इस बार रक्षाबंधन पर सर्वार्थ सिद्धि और दीर्घायु का संयोग बन रहा है।

रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त

इस बार बहने अपने भाइयों की कलाई पर 9 बजकर 30 मिनट पर राखी बांध सकती है। क्योंकि भद्र काल सुबह 9 बजकर 29 मिनट तक रहेगा। भद्र काल शुभ नहीं है। भद्र काल में ही रावण की बहन ने रावण को राखी बांधी थी। जिससे रावण का सर्वनाश हो गया था। 1 बजकर 35 मिनट से लेकर 4 बजकर 35 मिनट तक का समय भी शुभ रहेगा, जो राखी के लिए उचित समय है। शाम 7 बजकर 30 मिनट से लेकर 9 बजकर 30 मिनट तक भी बहन भाइयों को राखी सकती है।

रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है?

रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता इसके बारे में कोई सटीक जानकारी नहीं है। इस त्योहार के बारे में अलग अलग दंतकथाएं प्रचलित है। इस त्योहार को मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। इस त्योहार की हिन्दू धर्म में बड़ी मान्यता है। इसलिए इसके इतिहास के बारे में भी कई सारी कहानियां बताई गई है। जो रक्षाबंधन के इतिहास के बारे में बताती है तो दोस्तों आज हम जानेंगे उन कथाओं को जिससे रक्षाबंधन की शुरुआत हुई।

राजा बलि और माता लक्ष्मी की कहानी

राजा बलि भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक बार जब राजा बलि अपने राज्य में 100 वां अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे तभी भगवान विष्णु वामन का रूप धारण कर राजा बलि के राज्य में पधारे।

राजा बलि अपने 100 वें यज्ञ को बीच में ही छोड़कर उस वामन के सामने पहुंचे। वामन भगवान ने राजा बलि से कुछ दान देने का आग्रह किया। तभी राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि से यज्ञ पूर्ण होने तक कोई भी दान न देने का आग्रह किया। क्योंकि उनके गुरु शुक्राचार्य जान गए थे कि यह वामन कोई ओर नहीं बल्कि भगवान विष्णु है और दान में राजा बलि से उसका राजपाट छीनने आए हैं। राजा बलि ने शुक्राचार्य की एक नहीं सुनी और वामन को तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। भगवान वामन ने तीन पग में राजा बलि का सब कुछ ले लिया।

बाद में भगवान वामन अपने विष्णु रूप में आए और अपने भक्त बलि की भक्ति से प्रसन्न हुए। इसके बदले में भगवान विष्णु ने राजा बलि को उसके राज्य की रक्षा करने का वचन दिया। भगवान विष्णु वैकुंठ छोड़कर राजा बलि के महल में रहने लगे।

यह सब मां लक्ष्मी को अच्छा नहीं लगा। मां लक्ष्मी चाहती थी कि भगवान विष्णु वैकुंठ लौट आए। मां लक्ष्मी राजा बलि के महल में गई और राजा बलि के हाथों में एक धागा बांधा। इससे राजा बलि प्रसन्न हुए और मां लक्ष्मी को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया। राजा बलि ने मां लक्ष्मी से उपहार मांगने को कहा। मां लक्ष्मी ने बलि से कहा कि “वह भगवान विष्णु को अपने वचन से मुक्त कर दे। यही मेरी लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।” राजा बलि ने भगवान विष्णु को अपने वचन से मुक्त कर दिया। मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु खुशी खुशी वैकुंठ लौट आए।

महाभारत की कथा

महाभारत में पांडव राजकुमार युधिष्ठिर अपने राज्याभिषेक के समय भगवान कृष्ण का ज्यादा सम्मान कर रहे थे। इससे सभास्थल में बैठे चेदि राजकुमार शिशुपाल को यह सब अच्छा नहीं लगा। वह अपने स्थान से उठकर, कृष्ण जी को अपशब्द कहने लगा, क्योंकि शिशुपाल कृष्ण जी से जन्म जन्मांतर बैर रखता था। वह बार बार कृष्ण जी का अपमान किया रहा था और भगवान कृष्ण यह सब सुने जा रहे थे।

भगवान कृष्ण ने प्रतिज्ञा ली थी कि वह शिशुपाल के 100 बार किए अपमान को माफ कर देंगे लेकिन 101 बार किए गए अपमान को माफ नहीं करेंगे। शिशुपाल ने जैसे ही 101वीं बार भगवान कृष्ण का अपमान किया भगवान कृष्ण जी ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का सिर काट दिया।

इस दौरान सुदर्शन चक्र से भगवान कृष्ण जी की तर्जनी अंगुली घायल हो गई जिससे रक्त बहने लगा। इसे देखकर द्रौपदी ने साड़ी से थोड़ा कपड़ा फाड़ा और भगवान कृष्ण जी की अगुंली में बांध दिया। इससे भगवान कृष्ण जी प्रसन्न हुए। जब राजकुमार युधिष्ठिर जुए में द्रौपदी को हार गए थे तब दुहसासन ने द्रौपदी का चीर हरण किया। इस दौरान कृष्ण जी ने द्रौपदी के सतीत्व की रक्षा की थी।

इन्द्र की पत्नी सची की कहानी

भविष्य पुराण में कहा गया है कि जब असुरों के देवता राजा बलि और इन्द्र के बीच युद्ध हो रहा था तो इस युद्ध में राजा बलि इन्द्र पर भारी पड़े। इन्द्र को लगा है कि वह इस युद्ध को हार जायेंगे। वह युद्ध को बीच में ही छोड़कर अपनी पत्नी सची के पास गए। सची राजा बलि के द्वारा देवता लोक में की गई हानि को समझ गई और वह तुरंत भगवान विष्णु के पास गई।

उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि “हे प्रभु ! देवतालोक पर राजा बलि ने भारी क्षति पहुंचाई है और इन्द्र की पराजय निश्चित है। इस हार से बचने के लिए कोई समाधान बताए।” तब भगवान विष्णु ने सची को एक पवित्र धागा दिया और कहा कि वह इसे इन्द्र के हाथों में बांध दे। सची ने उस पवित्र धागे को इन्द्र के हाथों में बांध दिया। अगले दिन जब राजा बलि और इन्द्र युद्ध कर रहे थे तो बलि इस युद्ध में बुरी तरह हार गए।

यह परंपरा आगे भी चलती रही। राजा महाराजाओं के समय जब राजा और सैनिक युद्ध लड़ने जाया करते थे तो पत्नी और बहने उनकी कलाइयों में धागा बांधती थी। यह धागा एक रक्षा सूत्र तो जो आगे चलकर रक्षाबधंन में परिवर्तित हुआ।

शुभ और लाभ

शिव पुत्र गणेश के दो पुत्र शुभ लाभ है। यह शुभ और लाभ का प्रतीक है। एक बार उन्होंने पिता गणेश से बहन लाने की जिद की। भगवान गणेश ने मना किया। नारद जी यह सब सुन रहे थे। नारद जी भी भगवान गणेश जी के पास गए और उन्होंने भी शुभ और लाभ के लिए बहन लाने के लिए कहा।‌

इस पर भगवान गणेश जी मान गए। और अपनी पत्नी रिद्धि और सिद्धि के पास गए। अब तीनों ने अपनी शक्ति से मां संतोषी को उत्पन्न किया। मां संतोषी को शुभ और लाभ बहन के रूप में पाकर प्रसन्न हुए। यह रक्षाबंधन का ही दिन था जब शुभ और लाभ को मां संतोषी बहन के रूप में प्राप्त हुई।

राजा पोरस की लोककथा

सिकंदर यूनान का सम्राट था। वह कई लड़ाइयां जीत चुका था। 326 ईसा पूर्व में वह भारत की ओर बढ़ा। भारत में उस समय पोरस राजा राज कर रहा था। राजा पोरस वीर और साहसी था। जब सिकंदर की पत्नी को पता चला कि राजा पोरस पराकर्मी सम्राट है तो वह डर गई कि कहीं राजा पोरस सिकंदर को मार न दे। उसने अपने सेवक के हाथों राजा पोरस के लिए एक राखी भेजी।

सम्राट पोरस ने उस राखी को अपनी कलाई पर बांधा और सिकंदर की पत्नी को अपनी बहन माना। जब राजा पोरस और सिकंदर झेलम का युद्ध लड़ रहे थे तो पराकर्मी सम्राट पोरस ने सिकंदर पर कोई जानलेवा हमले नहीं किया।

रानी कर्णावती की कथा

रक्षाबंधन से सम्बन्धित यह ऐतिहासिक कहानी 1533 ईसवी की है। राजपूत रानी कर्णावती चित्तौड़ पर राज कर रही थी। वह अकेली थी क्योंकि उनके पति राणा सांगा युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। ऐसे में चित्तौड़ पर चारों ओर से संकट मंडरा रहा था।

गुजरात का शासक बहादुर शाह चित्तौड़ पर अधिकार करने की तैयारी कर रहा था। जब इस बात का पता रानी कर्णावती को चला तो वह घबरा गई। उस समय भी भारत में आज की तरह रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता। जो भाई बहन का प्रतीक था।

रानी कर्णावती ने एक राखी हुमायूं के पास भेजी और उससे कहा कि वह भाई के नाते चित्तौड़ की रक्षा करे। हुमायूं ने एक बड़ी सेना गुजरात के शासक बहादुर शाह के विरुद्ध भेजी। शाह हुमायूं की सेना को देखकर घबरा गया।

यम और यमुना

रक्षाबंधन से सम्बन्धित एक लोक कथा इस प्रकार है मृत्युलोक के देवता यम यमुना के भाई है। एक बार यम अपनी प्रिय बहन से मिलने बारह वर्ष तक नहीं गए। इतना लंबा समय हो जाने पर यमुना बहुत दुखी हुई। उसने यह पीड़ा मां गंगा को सुनाई। मां गंगा यम के पास गई और यमुना की पीड़ा के बारे में बताया।

यम यह बात सुनकर यमुना के पास गए। यमुना अपने भाई यम को देखकर बहुत प्रसन्न हुई। उसने यम का बहुत अच्छे से आदर सत्कार किया। अपनी बहन की प्रसन्नता को देखकर यम पर रहा न गया। उसने अपनी बहन से कोई वरदान मांगने को कहा।

वरदान में यमुना ने कहा कि मेरा भाई यम अपनी बहन से जल्दी जल्दी मिलने आया करे। यम ने इस वरदान को पूर्ण किया।और यमुना सदैव के लिए अमर हो गई।

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