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जहांगीर का इतिहास

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जहांगीर का इतिहास – अकबर की मृत्यु के बाद 1605 ई. को जहांगीर आगरा की गद्दी पर बैठा। यह मुगल वंश का चौथा शासक था और अकबर का पुत्र था। जहांगीर के काल को  ‘चित्रकला का स्वर्णकाल‘ भी कहा जाता है। इसके काल में चित्रकला अपने चरमोत्कर्ष पर थी। नुरूद्दीन मोहम्मद जहांगीर का जन्म 29 अगस्त, 1569 ई. को मरियम उज्जमानी उर्फ जोधाबाई के गर्भ से हुआ था। जहांगीर का मूल नाम सलीम था, क्योंकि इसका जन्म सूफी संत शेख़ सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से हुआ था। इसका शिक्षक अब्दुर्रहीम खानखाना था।

जहांगीर का पहला विवाह 1585 ई. में आमेर के राजा भगवानदास की बेटी और मानसिंह की बहन मानबाई से हुआ था, जिससे कालान्तर में खुसरो का जन्म हुआ। दूसरा विवाह 1586 ई. में मारवाड़ के राजा उदयसिंह की बेटी जगतगोसाई से हुआ, जिससे कालान्तर में खुर्रम का जन्म हुआ, जो इतिहास में मुगल बादशाह शाहजहां के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राज्याभिषेक के बाद तीसरा विवाह 1611 ई. में अली कुलीबेग की विधवा मेहरून्निसा से हुआ जो इतिहास में नूरजहां के नाम से प्रसिद्ध हुई। जहांगीर इससे बेहद प्रभावित था।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

जहांगीर की धार्मिक नीति

जहांगीर एक न्यायप्रिय शासक था, इसने आगरा में यमुना नदी के किनारे सोने की ‘न्याय की प्रसिद्ध जंजीर‘ लगवाई थी, जिसमें 60 घंटियां थी, जिसे कोई भी फरियादी घंटी बजा कर न्याय मांग सकता था। जहांगीर ने अपने साम्राज्य में 12 अध्यादेश जारी किए, इन अध्यादेश को ‘आईने जहांगीर‘ कहा जाता है। जहांगीर एक सहिष्णु शासक था। इसने 1612 ई. में पहली बार रक्षाबंधन का त्योहार मनाया और अपने हाथ पर राखी बंधवायी।

जहांगीर ने श्रीकांत नामक हिन्दू को हिन्दुओं का जज नियुक्त किया। इसने पिता अकबर की नीति का पालन किया और गोहत्या निषेध को जारी रखा। जहांगीर ने दीपावली पर जुआ खेलने की इजाजत दी और स्वयं भी जुआ खेलता था। यह हिंदू मंदिरों को दान देता था और जदरूप नामक हिन्दू संत से अत्यधिक प्रभावित ‌‌‌‌था। इसने सूरदास जी को आश्रय दिया, इन्हीं के काल में सूरदास जी ने ‘सूरसागर’ की रचना की। जहांगीर ने ही खुसरो के विद्रोह में मदद करने के लिए सिक्खों के पांचवें गुरु अर्जुनदेव को फांसी दी थी।

जहांगीर के समय में अंग्रेजों का आगमन

जहांगीर के शासनकाल में व्यापार के उद्देश्य से प्रथम अंग्रेज विलियम हाकिंस (1608 -1611 ई.) भारत की यात्रा पर आया। यह इंग्लैंड के सम्राट जेम्स प्रथम का राजदूत था। यह तुर्की अौर फारसी में निपुण था, इससे प्रभावित होकर जहांगीर ने इसे ‘इंग्लिश खान’ की उपाधि दी। इसके बाद अंग्रेज टॉमस रो (1615 -1619 ई.) भारत की यात्रा पर आया। जहांगीर के काल में ही अंग्रेजों ने 1613 ई. में प्रथम कोठी सूरत में स्थापित की थी।

जहांगीर के समय में इत्र का आविष्कार

नूरजहां की मां का नाम अस्मत बेगम था। इसने गुलाब से इत्र बनाने की विधि का आविष्कार किया हालांकि नूरजहां और अस्मत बेगम दोनों को गुलाब से इत्र बनाने का आविष्कारक माना जाता है। जहांगीर ने अपनी प्रेमिका अनारकली के लिए 1615 ई. में लाहौर में एक कब्र बनवाई जिस पर लिखा था, “यदि मैं अपनी प्रेमिका का चेहरा एक बार फिर देख पाता, तो कयामत के दिन तक अल्लाह को धन्यवाद देता।”

जहांगीर के समय में विद्रोह

पुत्र खुसरो का विद्रोह

जहांगीर के गद्दी पर बैठते ही प्रथम विद्रोह 1606 ई. में पुत्र खुसरो ने किया। इस विद्रोह में इसके साथ हुसैनबेग और अब्दुर्रहीम भी थे। ऐसे में बाप – बेटे के बीच युद्ध होना संभव था। दो‌नों के बीच जालंधर के निकट भेरावाल नामक स्थान पर युद्ध हुआ, जिसमें खुसरो पराजित हुआ और उसे बंदी बना लिया गया। जहांगीर ने इसे अंधा करवा दिया। 1622 ई. में शाहजहां ने इसकी हत्या करवा दी। इस युद्ध में खुसरो की सहायता करने के लिए शिक्खों के पांचवें गुरु अर्जुनदेव को फांसी दी गई‌।

जहांगीर के विजय अभियान

मेवाड़ विजय

राजस्थान के ज्यादातर राजपूत राजाओं ने मुगलों की अधीनता स्वीकार की थी, लेकिन मेवाड़ एकमात्र ऐसा राज्य था, जिसने मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की और मुगलों से बराबर लोहा लेता रहा। जहांगीर के समय में यहां का शासक प्रताप सिंह का पुत्र अमर सिंह था। जहांगीर ने मेवाड़ विजय के लिए (1605 – 1615 ई.) कई अभियान भेजे, लेकिन सफलता नहीं मिली। अन्तत 1615 ई. में दोनों के बीच संधि हुई। इस प्रकार मेवाड़ ने मुगलों की अधीनता स्वीकार की।

दक्षिण विजय

जहांगीर ने साम्राज्य विस्तार के लिए अपने पिता अकबर की दक्षिणी नीति का अनुसरण किया। जहांगीर ने दक्षिण में अहमदनगर विजय की योजना बनाई। यह इस समय का शक्तिशाली राज्य था। यहां का योग्य सेनापति मलिक अम्बर था। इसके नेतृत्व में अहमदनगर का खूब विस्तार हो रहा था। इस विस्तार को रोकने के लिए जहांगीर ने अहमदनगर के विजय हेतु कई अभियान शहजादा परवेज, शाहजहां और अब्दुर्रहीम खानखाना के नेतृत्व में भेजे। अन्तत 1617 ई. में बीजापुर के शासक की मध्यस्थता से जहांगीर और मलिक अम्बर के बीच संधि हुई। इस प्रकार अहमदनगर ने मुगलों की अधीनता स्वीकार की। इस संधि के बाद जहांगीर ने पुत्र खुर्रम को शाहजहां की उपाधि प्रदान की।

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